अमित पाठक अपनी कलम से ✍️
पिपरी नगर पंचायत के चुनाव हर बार नए वादों, नए दावों और नए नारों के बीच होते हैं, लेकिन एक मुद्दा वर्षों से जस का तस खड़ा है जमीन का मालिकाना हक़। 1995 से लेकर 2025 चल रहा है लगभग तीस साल का हो चुका है, लेकिन पिपरी के लोग अभी भी उसी मूल सवाल के साथ खड़े हैं कि “आखिर हमारी ज़मीन पर हमारा हक कब मिलेगा?”
हालात यह हैं कि पिपरी की जमीनें की स्थिति में पहुंच चुकी हैं। न तो लोग पूरी तरह मालिक कहलाते हैं, न ही उन पर अधिकारिक विकास का लाभ बखूबी मिल पाता है। कभी इन जमीनों पर वन विभाग का दावा, तो कभी सिंचाई विभाग का हस्तक्षेप, और कभी विभागीय फाइलों में उलझती आपत्तियाँ इन सबके बीच आम जनता वर्षों से अपने हक़ का इंतजार कर रही है।
स्थानीय लोग कहते हैं कि चुनाव आते ही नेताओं की भाषा बदल जाती है। हर बार यह मुद्दा प्रमुखता से उठता है कि “इस बार समस्या का समाधान होगा, मालिकाना हक़ मिलेगा।” लेकिन जैसे ही चुनाव ख़त्म होता है, यह मुद्दा फिर विभागों की फाइलों में गुम हो जाता है।
पिपरी नगर पंचायत के नागरिकों का कहना है कि बिना मालिकाना हक़ के मकान न ठीक से बन पाते हैं,
न बैंक ऋण मिल पाता है,
न सरकार की कई ऐसी योजनाओं का लाभ पूरी तरह मिलता है।
यानी विकास की नींव ही अधर में लटकी रहती है।
अमित पाठक अपनी कलम से लिखते हुए मौजूदा सरकार से आग्रह हैं कि
पिपरी की जनता खौफ में जी रही है योगी जी
विभागों की खींचतान खत्म की जाए, ज़मीनों का नियमितीकरण हो, और पिपरी के हजारों परिवारों को उनका वास्तविक, कानूनी मालिकाना हक़ मिले।
